Thursday, June 29, 2017

पतझड़

हरे थे जब पात
अपनों का था साथ
गूँजते थे स्वर 
टहनियों पर बने घोंसलों से।


रह गया जब ठूंठ
अपने गये छूट
सपने गये रूठ,
कितना अपना सा लगता
एक पल का साथी भी
जीवन के सूनेपन में।

...©कैलाश शर्मा

Monday, May 29, 2017

दर्द बिन ज़िंदगी नहीं होती

दर्द जिसकी दवा नहीं होती,
ज़िंदगी फ़िर सजा नहीं होती।

चाँद आगोश में छुपा जब हो,
नींद भी नींद है नहीं होती।

ज़िंदगी साथ में गुज़र पाती,
चाँद की चांदनी नहीं रोती।

कुछ तो कह कर जो गये होते,
तस्कीने दिल कुछ हुई होती।


दर्द हर दिल का बाशिंदा है,
दर्द बिन ज़िंदगी नहीं होती।

...©कैलाश शर्मा 

Tuesday, April 18, 2017

क्षणिकाएं

    (1)
चहरे पर जीवन के
उलझी पगडंडियां
उलझा कर रख देतीं
जीवन के हर पल को,
जीवन की संध्या में
झुर्रियों की गहराई में
ढूँढता हूँ वह पल
जो छोड़ गये निशानी
बन कर पगडंडी चहरे पर।

    (2)
होता नहीं विस्मृत
छोड़ा था हाथ
ज़िंदगी के
जिस मोड़ पर।
ठहरा है यादों का कारवां
आज भी उसी मोड़ पर,
शायद देने को साथ
मेरे प्रायश्चित में
थम गया है वक़्त भी
उसी मोड़ पर।


    (3)

आसान कहाँ हटा देना
तस्वीर दीवार से
पुराने कैलेंडर की तरह,
टांग देते नयी तस्वीर
पुरानी ज़गह पर,
लेकिन रह जाती
खाली जगह तस्वीर के पीछे
दिलाने याद उम्र भर।

...©कैलाश शर्मा 

Sunday, March 12, 2017

दुख दर्द दहन हो होली में

दुख दर्द दहन हो होली में,
हो रंग ख़ुशी के होली में।

तन मन आंनदित हो जाये,
जब रंग उड़ेंगे होली में।

सब भेद भाव मिट जायेंगे,
जब गले मिलेंगे होली में।

जब पिया गुलाल लगायेंगे,
तन मन सिहरेगा होली में।


मन से मन का जब रंग मिले,
तन रंग न चाहे होली में।

...©कैलाश शर्मा 

Tuesday, March 07, 2017

बेटी

आँगन है चहचहाता, जब होती बेटियां,
गुलशन है महक जाता, जब होती बेटियां।

आकर के थके मांदे, घर में क़दम रखते,
हो जाती थकन गायब, जब होती बेटियां।

रोशन है रात करतीं, जुगनू सी चमक के,
जीने की लगन देती, जब होती बेटियां।

जीवन में कुछ न चाहा, बस प्यार बांटती,
दिल में है दर्द होता, गर रोती बेटियां।

जाती हैं दूर घर से, यादें हैं छोड़ कर,
आँखों में ख़ाब बन के, बस सोती बेटियां।

...©कैलाश शर्मा 

Monday, February 27, 2017

कैसी यह मनहूस डगर है

भूल गयी गौरैया आँगन,
मूक हुए हैं कोयल के स्वर,
ठूठ हुआ आँगन का बरगद,
नहीं बनाता अब कोई घर।

लगती नहीं न अब चौपालें,
शोर नहीं बच्चों का होता।
झूलों को अब डाल तरसतीं,
सावन भी अब सूना होता।

पगडंडी सुनसान पडी है,
नहीं शहर से कोई आता।
कैसी यह मनहूस डगर है,
नहीं लौटता जो भी जाता।
  

कंकरीट के इस जंगल में,
अपनेपन की छाँव न पायी।
आँखों से कुछ अश्रु ढल गये,
आयी याद थी जब अमराई।


पंख कटे पक्षी के जैसे,
सूने नयन गगन को तकते।
ऐसे फसे जाल में सब हैं,
मुक्ति की है आस न करते।

...©कैलाश शर्मा 

Tuesday, January 31, 2017

क्षणिकाएं

जीवन की सांझ
एक नयी सोच
एक नया दृष्टिकोण,
एक नया ठहराव
सागर की लहरों का,
एक प्रयास समझने का
जीवन को जीवन की नज़र से।
*****

होता है कभी आभास
किसी के साथ होने का
घर के सूनेपन में,
दिखाता है कितने खेल
यह सूनापन
बहलाने को एकाकी मन।
*****


ज़िंदगी
एक अधूरी नज़्म,
तलाश कुछ शब्दों की
जो छूट गए पीछे
किसी मोड़ पर।

...©कैलाश शर्मा